Unknown Realm
12/10/2025
💐हरिहर💐
12/10/2025
*शरीरस्थ नाडी एवं षट्चक्र*
यह पञ्चभूतनिर्मित शरीर ही विश्व कहा जाता है। चन्द्र सूर्य अग्नि रूप तेज से समन्वित यह जीवरूपी ब्रह्म वाला है। इस शरीर में साढ़े तीन करोड़ नाड़ियाँ स्थित मानी गयी हैं। उनमें दश मुख्य हैं । उन दश में भी तीन सर्वप्रमुख हैं। इनमें सर्वप्रधान नाडी मेरुदण्ड में स्थित है । ये तीनों नाड़ियाँ चन्द्र सूर्य और अग्नि रूप हैं । वह अर्थात् ल सुषुम्ना नाड़ी शक्तिरूपा है । जो साक्षात् अमृतरूपा है वह इडा नाडी मेरुदण्ड के बायें भाग में स्थित है । यहननाडी शुक्ल वर्ण की तथा चन्द्ररूपिणीनहै । पिङ्गला नाडी जो कि मेरुदण्ड के दायें पार्श्व में स्थित है, पुरुषरूपा तथा सूर्यविग्रहा है । यह अनार के फूल के रंग की है। दूसरी अर्थात् पिङ्गला नाडी साक्षात् विष कही गयी है । जो मेरु के अन्दर स्थित है तथा मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है; सर्वतेजोमयी वह सुषुम्ना है जो कि अग्निरूपिणी है । उस सुषुम्नाके मध्य में एक विचित्रा नाम की नाडी है । यह अमृतस्राव करने वाली शुभ नाडी सर्वदेवमयी और योगियों की अत्यन्त प्रिय है । यह विसर्ग से लेकर बिन्दु पर्यन्त व्याप्त होकर विराजमान है।
कुंडलिनी अभिसार क्रम से गुणवृद्धिशून्य अचल पति के पास जाकर प्रकाशित होती है तथा कौलमार्ग के द्वारा गुणयुक्त होती हुई आनन्द का विस्तार करती है; जो सोये हुए सर्प के बच्चे के समान कुटिल होकर मेरुदण्ड के मूल में स्थित हुई मुरजित् अर्थात् विष्णु आदि सैकड़ों प्रमुख पुत्रों की सृष्टि करती है, वह आपकी रक्षा करें । कुण्डलिनी नामक चित्शक्ति प्रत्येक प्राणी के शरीर मेंनवर्त्तमान रहती है । वह मेरुदण्ड के नीचे साढ़े तीन गोलाई में स्थित रहती है । साधना के द्वारा यह ऊपर चलती है और अनेक चक्रों का भेदन करती हुई शिर में स्थित सहस्रदल कमल में पहुँचती है । वहाँ वह परम शिव, जो कि उसके पति के रूप में शास्त्रों में वर्णित है, से मिलकर तन्मय हो जाती है । यह कुण्डलिनी विश्वशक्तिमयी है जो ब्रह्मा विष्णु रुद्र तथा शिव के साथ समस्त संसार की सृष्टि करती हुई उसका पालन और संहार भी करती है।
भर्तारं गुणवृद्धिशून्यमचलं गत्वाभिसारक्रमाद्
दीव्यन्ती कुलवर्त्मनैव गुणवत्यानन्दमातन्वती।
शेते सुप्तभुजङ्गपोतकुटिला या मेरुमूलं गता
सूते शतानि तानि मुरजिन्मुख्यानि पायादसौ॥
- इतिश्रीमेरुतन्त्रे
31/08/2025
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